कुरुक्षेत्र के युध्क्षेत्र में
शरशैया पर पड़े भीष्म ने समय से पूछा
तात की इच्छा पूर्ति में यौवन दिया
मात की इच्छा पूर्ति में अपना राज दिया
राज रक्षा में सदा रहा सजग
मुकुट के आगे रहा नतमस्तक
माँ की आज्ञा से गया स्वयंवर
अनुजो के लिए लाया कन्यावर
ढाल बनकर रहा सदा अंधे धृत राष्ट्र की
करता रहा रक्षा सदा राष्ट्र की
उचित अनुचित में प्रण न त्यागा
अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा
युद्ध रोकने के लिए किये कई प्रयास
पर न रुका तो भी खोयी नहीं आस
मुकुट के साथ रहा यह थी विवशता
पाण्डु प्रिय थे पर उनके विरुद्ध रहा यह थी विवशता
सेनापति धर्म पूरा निभाया
पर जब आया आगे प्रण उसे भी निभाया
आज पड़ा हूँ शरशैया पर विवश हूँ
समय मैं तुमसे पूछता हूँ क्या कमी थी मेरे कृत्य में
क्या दोष था मेरे सत्य में
वह किया जो उचित था
वह नहीं किया जो अनुचित था
फिर यह पीड़ा क्यों भोग रहा हूँ
फिर यह त्रास क्यों भोग रहा हूँ उत्तर दो समय
समय कुछ रुका फिर बोला
तुम रहे सदा अप्रतिम रहे
सदा तुम अविजित
तुमने जो कहा वह सुना
तुमने जो किया वह भी सुना
कर्मो का विज्ञान तुम जानते हो
कर्मफल का सार भी तुम जानते हो
तो सुनो समय हूँ
जो देखा वही बताता हूँ
जो जाना वही सुनाता हूँ
स्वयंवर का यह आचार है
जो वँहा नहीं जाता उसका नहीं अधिकार है
अगर अनुज नहीं कर सकते थे कन्या वरन
तो क्यों किया तुमने उनका हरण
यह स्वयंवर मर्यादा का उलन्घन था
यह कृत्य तुम्हारा अक्षम्य था
अम्बालिका को छोड़ा यह तो उचित था
पर लौट आयी तो उसका त्याज्य अनुचित था
उसे वह न मिला जो मिलना था
तो उससे शापित तो तुम्हे होना ही था
और सुनो गंगापुत्र
दुर्योधन की कुटिलता तुम्हे ज्ञात थी
शकुनि की कुचालें तुम्हे ज्ञात थी
द्द्युत क्रीड़ा का परिणाम भी तुम जानते थे
धृतराष्ट्र का लोभ तुम जानते थे
द्युतक्रीड़ा के निमंत्रण पर तुम मौन रहे
शकुनि की कपटता पर तुम मौन रहे
द्रौपदी के दाव को तुमने रोका नहीं
उसे पकड़ लाये जाने को तुमने रोका नहीं
कर्ण के अपशब्दों को तुम सहते रहे
अपनी वधु का अपमान तुम सहते रहे
चीर हरण के आदेश पर तुम चुप रहे
दुशासन के कृत्य पर तुम मूक रहे
और तो और गंगापुत्र
द्रौपदी की विनती पर भी तुम मौन रहे
सक्षम होकर भी अन्याय जो सहता है
सक्षम होकर भी पाप जो सहता है
वह अन्यायी से भी बड़ा अन्यायी होता है
पापी से बड़ा पापी होता है
ये अपराध तुमसे हुए है
ये पाप तुमसे हुए है
इनका फल तो मिलना ही था
जो हुआ है वह तो होना ही था
तुम ज्ञानी हो इस पर विचार करो
जो मिला है उसे स्वीकार करो
गंगापुत्र जो पूछा वह बता दिया
समय हूँ सब सत्य बता दिया
जाते जाते एक राज़ तुम्हे बता दूँ
तुम अभी भी अपने श्रेष्ट कर्मो से युक्त हो
यह तुम्हारा अंतिम जन्म है
अब तुम जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो||
- डॉ बालकृष्ण जगानी पुरोहित
कर्मफल का सार भी तुम जानते हो
तो सुनो समय हूँ
जो देखा वही बताता हूँ
जो जाना वही सुनाता हूँ
स्वयंवर का यह आचार है
जो वँहा नहीं जाता उसका नहीं अधिकार है
अगर अनुज नहीं कर सकते थे कन्या वरन
तो क्यों किया तुमने उनका हरण
यह स्वयंवर मर्यादा का उलन्घन था
यह कृत्य तुम्हारा अक्षम्य था
अम्बालिका को छोड़ा यह तो उचित था
पर लौट आयी तो उसका त्याज्य अनुचित था
उसे वह न मिला जो मिलना था
तो उससे शापित तो तुम्हे होना ही था
और सुनो गंगापुत्र
दुर्योधन की कुटिलता तुम्हे ज्ञात थी
शकुनि की कुचालें तुम्हे ज्ञात थी
द्द्युत क्रीड़ा का परिणाम भी तुम जानते थे
धृतराष्ट्र का लोभ तुम जानते थे
द्युतक्रीड़ा के निमंत्रण पर तुम मौन रहे
शकुनि की कपटता पर तुम मौन रहे
द्रौपदी के दाव को तुमने रोका नहीं
उसे पकड़ लाये जाने को तुमने रोका नहीं
कर्ण के अपशब्दों को तुम सहते रहे
अपनी वधु का अपमान तुम सहते रहे
चीर हरण के आदेश पर तुम चुप रहे
दुशासन के कृत्य पर तुम मूक रहे
और तो और गंगापुत्र
द्रौपदी की विनती पर भी तुम मौन रहे
सक्षम होकर भी अन्याय जो सहता है
सक्षम होकर भी पाप जो सहता है
वह अन्यायी से भी बड़ा अन्यायी होता है
पापी से बड़ा पापी होता है
ये अपराध तुमसे हुए है
ये पाप तुमसे हुए है
इनका फल तो मिलना ही था
जो हुआ है वह तो होना ही था
तुम ज्ञानी हो इस पर विचार करो
जो मिला है उसे स्वीकार करो
गंगापुत्र जो पूछा वह बता दिया
समय हूँ सब सत्य बता दिया
जाते जाते एक राज़ तुम्हे बता दूँ
तुम अभी भी अपने श्रेष्ट कर्मो से युक्त हो
यह तुम्हारा अंतिम जन्म है
अब तुम जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो||
- डॉ बालकृष्ण जगानी पुरोहित